BioChemorganics Seeds OATS
जई (OATS) फसल उत्पादन की समग्र सिफारिशें
1. भूमि :-
जई उत्पादन के लिए दोमट या रेतीली दोमट परन्तु समुचित जल निकास वाली भूमि उत्तम है। भूमि रेहीली (Alkaline) न हो।
2. किस्में :-
OAT. Kent
3. बीज की मात्रा :-
उत्तम उत्पादन के लिये 30 किलो गुणवत्ता युक्त बीज प्रति एकड़ पर्याप्त है।
4. बिजाई का समय :-
जई बिजाई का उत्तम समय अक्टूबर के द्वितीय सप्ताह से अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह है परन्तु कृषक नवम्बर के अन्तिम सप्ताह तक भी जई की खेती करते हैं।
5. बिजाई का तरीका :-
बिजाई केरा या सीड ड्रिल से करें। लाइनों के मध्य 20 सें.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 5 से.मी. रखें। 30 किलो बीज की मात्रा का ही प्रयोग कर X क्रॉस बिजाई करने से उत्पादन अधिक आता है। धान काटने पर जई की बिजाई जीरो टिल ड्रिल द्वारा की जा सकती है।
6. बीजोपचार :-
बीज को 2 ग्राम प्रति किलो विटावैक्स या कार्बनडाजिम या टेबुकोनाजोल से उपचारित कर बोयें। कवकनाशी के साथ ही एक एजोटीका प्रति 10 किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें।
7. खाद एवं उर्वरक :-
जई की अच्छी पैदावार लेने के लिये 15 किलो नाइट्रोजन (40 किलो युरिया) 8 किलो फोसफोरस (P,O,) (50 किलो सिंगिल सुपरफासफेट) तथा (15 किलो नाइट्रोजन) बिजाई के 30-40 दिन बाद देनी चाहिए।
BioChemorganics Seeds OATS Crop Production
8. सिंचाई :-
पलेवा-बिजाई से पूर्व सिंचाई के साथ 3-4 सिंचाई जई के श्रेष्ठ उत्पादन हेतु उचित है। ध्यान रहे उत्तम उत्पादन लेने के लिये प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई अवश्य करे।
9. खरपतवार नियन्त्रण :-
जीरो टिलेज बिजाई करने वाले खेत में खरपतवार नष्ट करने के लिये बिजाई से पूर्व ही ग्रामोक्सोन Paraquat 500 ml / प्रति एकड़ की दर से छिड़क दें। खरपतवार नष्ट करने के लिये बिजाई से पूर्व एक सिंचाई कर. खरपतवार उग आने पर जुताई कर नष्टकिये जा सकते हैं।
10. फसल संरक्षण :-
जई में खुली कगियारी व्याधि Loose Smut of Oats आती है इसके लिये 2 ग्राम कार्बोक्सिन या कार्बनडाजिम या एक ग्राम प्रति किलो टेबुकोनाजोल (Raxil) से बीज उपचारित कर उपयोग में लायें।
टिप्पणी :-
इस विवरणिका में फसल उत्पादन की समग्र सिफारिशें कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि ज्ञान केन्द्रों, कृषि विज्ञान केन्द्रों के कृषि वैज्ञानिकों, प्रगतिशील किसानों तथा सरकार के कृषि विदों के अनुसन्धान एवं अनुभवों पर आधारित है। फसल / किस्म का उत्पादन मात्र बीज पर निर्भर नहीं करता बल्कि भूमि, खाद, उर्वरक तथा अन्य कारकों तथा वातावरण पर निर्भर करता है। भिन्न प्रदेशों/क्षेत्रों के कृषक स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों, कृषि विदों की सलाह और स्वयं के अनुभव का उपयोग कर उत्तम ही नहीं सर्वोत्तम उत्पादन ले सकते हैं।
